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    Sunday, 2 July 2017

    1 जुलाई 1905 के दिन जन्मे में थे स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल कय्यूम अंसारी


    1 July 1905 में जन्मे अब्दुल कय्यूम अंसारी एक स्वतंत्रता सेनानी थे।अंसारी साहब देश के लिए अपनी कर्मठता,जुझारूपन और आपसी भाई चारे के लिए जाने जाते है।वो उन नेताओ में से थे जो भारत राष्ट्र को तोड़ने के पक्ष में और अलग राष्ट्र के बनने के पक्ष में नहीं थे

    देहरी-ओन-सोने, बिहार के एक धनी परिवार में जन्मे अंसारी साहब अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी,कलकत्ता युनिवेर्सिटी और इलाहबाद यूनिवर्सिटी गए। बार बार आज़ादी के अन्दोलानो में कूदने के कारण उनकी पढ़ाई काफी बाधित रही।

    आज़ादी की लड़ाई उन्होंने अपनी उम्र के शुरूआती हिस्से से ही लड़नी शुरू कर दी थी जब उन्होंने स्कूल से अपना नाम कटवा लिया था क्युकी वो अंग्रेजी हुकूमत का था। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर इंडियन नेशनल कांग्रेस की विदेशी स्कूल छोड़ो की नीति पर चलते हुए ऐसे छात्रो के साथ मिल कर एक विद्यालय गठित किया जो खुद विदेशी स्कूल का बहिष्कार करके आये थे।इसकी वजह से 16 साल की उम्र में उन्हें जेल जाना पड़ा जहा से उनके स्वतंत्रता संग्राम को नयी दिशा मिली

    उन्होंने एक युवा नेता बनकर कलकत्ता में साइमन कमीशन का विरोध 1928 में किया जब साइमन का कलकत्ता में दौर था

    अंसारी साहब न सिर्फ एक अचछे नेता थे बल्कि एक समृद्ध पत्रकार,लेखक और कवि भी थे। वो साप्ताहिक उर्दू "अल इस्लाह" और महाना उर्दू "मुसवात" में बतौर संपादक कार्य भी किया।

    उन्होंने मुस्लिम लीग की अलगाववादी नीतियों का विरोध किया और 1937-38 में मोमिन आन्दोलन चलाया जिसके अंतर्गत वो गरीब और पिछड़ी जातियों के उद्धार के काम में लग गये

    मोमिन आन्दोलन ने इंडियन नेशनल कांग्रेस का ,भारत की आजादी,एकता,अखंडता और सामाजिक बराबरी के लिए साथ दिया

    गरीब और पिछड़े लोगो के नायक अंसारी साहब ने शिक्षा के क्षेत्र में 1953 को आल इंडियन बैकवर्ड क्लासेस कमीशन को भारत सरकार द्वारा गठित करवाया। जो वाकई एक बड़ा कदम था

    18 जनवरी 1973 को इस्लाम और भारत के इस मुजाहिद ने उस वक़्त दुनिया को अलविदा कहा जब वो "देहरी-अर्रह" नाम की कैनाल के धवस्त होने के बाद गाँव में मुआयना और ज़रुरत मंदों की मदद कर रहे थे

    भारत के इस मुजाहिद को हिंदी उस्ताद सलाम करता है और इस बात पर आपका ध्यान खीचना चाहता है की इस देश को हमारे बड़ो ने तो सीचा पर इतिहास लिखने वालो ने उनके साथ वो रवैया नहीं अपनाया जो अपनाना चाहिए था

    मैं कोई ताज्जुब नहीं की इन जैसे मुजाहिद का नाम शायद आपने आज ही सुना हो क्योकि एक पक्ष ने हमेशा हमारे साथ भेदभाव किया है

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