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    Thursday, 29 June 2017

    अब अमेरिका में बेघरों को मुफ्त खाना खिलाते है गरीबी का दंश झेल चुके क़ाज़ी मन्नान



    वाशिंगटन : फ्रेंक्लिन स्क्वायर की एक चमचमाती सुबह जहां डेविड प्रोक्टर नाम का एक व्यक्ति दान में मिले कपडे पहन कर खुद को न केवल गर्म रखने की जुगत में लगा है लेकिन अपने लिए एक अदद छत और खाने के लिए प्रतिदिन संघर्ष करता है। अमेरिका में रहने वाला प्रोक्टर एक बेघर है उसके लिए ज़िन्दगी सड़क पर शुरू होकर रोटी कपडे और छत के लिए लड़ते हुए बीत जाती है
     प्रोक्टर कहते है :

    " हां यह मुश्किल है , दर्द भरा है मैं देखता हूँ लोग बेघरों पर हसँते या इग्नोर करते है लेकिन हकीकत में कोई भी बेघर होने से कुछ ही कदम दूर ही होता है "

    फ्रेंक्लिन स्क्वायर वाशिंगटन का व्यस्त इलाका है। वाशिंगटन न केवल वाइट हाउस के लिए प्रख्यात है बल्कि अब यहाँ ऐसा भी कुछ होता है जो मानवता को जीवित करता है।  मयूर कबाब हाउस , पाकिस्तानी मूल के क़ाज़ी मन्नान का है। हर रोज़ की तरह दावूद प्रोक्टर जैसे लोगो को मुफ्त खाना खिलाते है। .




    कुछ महीनों से क़ाज़ी मन्नान बेघरों के लिए अपने रेस्टोरेंट में खाने की मुफ्त सुविधा देते आ रहे है।  वह न केवल उनको मुफ्त खाना देते है बल्कि उनके साथ आम ग्राहक की तरह बर्ताव भी करते है।  मन्नान कहते है :

    " कभी 15 से 20 बेघर आजाते है तो कभी कोई नहीं आता , हमारा स्टाफ प्रतिदिन अल्लाह से दुआ करता है कि किसी न किसी ज़रूरतमंद को अवश्य भेज दे "

    डैरेन स्टेटन , कई वर्षो से एक बेघर व्यक्ति है कहते है कि क़ाज़ी का बुलावा हमारे लिए ईश्वर के आशीर्वाद जैसा है।  यह हमारे लिए खाना लाता है हमे खिलता है।  इस काम के लिए हमे बहुत मेहनत करनी पड़ती थी



    मन्नान अपने बेघर मेहमानों को कहते नहीं थकते कि तुम सभी मेरे लिए अति महत्वपूर्ण हो 

    क़ाज़ी मन्नान इन लोगो का दर्द अच्छी तरह समझते है क्योकि पाकिस्तान के छोटे से गाँव में उन्होंने कई दर्दनाक राते गुज़ारी है। क़ाज़ी की इच्छा जहां तक हो सके मानवता से वो दर्द दूर भागने की है जिसे वह सहते हुए बड़े हुए है।



    मन्नान कहते है  :

    "न हमारे पास बिजली थी न ही पीने को पर्याप्त पानी। मेरा स्कूल भी बस एक पेड़ था जिसके नीचे हम पढ़ते थे और बारिश के दिनों में वो भी स्थगित हो जाता था ."

    12 वर्ष की आयु से सब्ज़ी और बर्फ बेचकर मन्नान ने अपने परिवार का साथ दिया। पढ़ाई जारी रखने के लिए रोज़ 4 मील पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता था।  1996 में पढ़ाई पूरी करने के बाद 25 वर्ष के मन्नान ने अमेरिका आने की सोची, वीसा और जहाज़ के टिकट के लिए पैसे उधार लिए।  अमेरिका में उन्होंने गैस स्टेशन पर खजांची का काम किया जो 3 डॉलर प्रति घण्टा की दर से था।

    मन्नान कहते है

    "जब मैं अमेरिका आया तब मेरे पास चंद डॉलर थे , मैंने यहाँ कुछ नहीं से शुरू किया , मैंने 2 शिफ्ट में अलग अलग काम किया , कई तरह की नौकरियां की और 20 साल बाद आज मैं इन होटल का मालिक हूँ।  लिमोज़ीन मेरा सपना था मैंने वो भी ले ली है।"



    क़ाज़ी कहते है:

    " मुझे बेघरों के खाना पकाने से प्यार है "

    हर रविवार मन्नान अतिरिक्त खाना बना कर खुद जॉर्ज टाउन मिनिस्ट्री सेंटर ले जाते है जहां कई बेघरों को खाना खिलाया जाता है। मन्नान मानते है कि अगर उन्होंने खाना खिलाना बंद कर दिया तो उनका व्यवसाय भी बंद हो जायेगा।  वो मानते है कि जितना वो देंगे अल्लाह उनको उतना और देगा। मन्नान कहते है :

    " मैं सोचता हूँ यह सब अल्लाह की तरफ से है क्योकि यह उसी का मिशन है"



    मन्नान कहते है उनको उनकी माताजी की एक बात हमेशा याद आती है. वो कहती थी

    " बेटा , अगर तुम्हारे पास पर्याप्त न भी हो तब भी बांटना , अल्लाह तुमको अँधेरे से रौशनी की ओर ले जायेगा"

    क़ाज़ी मन्नान कहते है कि एक दिन वह वापस पाकिस्तान जायेंगे और महिलाओ एवं बच्चो के लिए सशक्तिकरण केंद्र खोलेंगे

    हिंदी उस्ताद क़ाज़ी मन्नान जैसे लोगो को सलाम करता है


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    स्पांसर पोस्ट 



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