हममें से कितने ऐसे लोग है जो अपने चेहरे पर मात्र एक छोटा सा पिम्पल आने पर कहते है " mah lyf z juzz fnshd dude", लेकिन कुछ शख्स ऐसा भी है जिसपर पिम्पल का पहाड़ टूट पड़ा है लेकिन अभी भी उसने जिंदगी से हार नहीं मानी।
उमर हैदराबाद में जन्मे थे। जन्म के समय वह एक साधारण शिशु ही थे। 14 वर्ष की आयु में पहली बार यह ट्यूमर निकला। उमर की माताजी में बस एक ट्यूमर था। उन्होंने तब सोचा कि यह भी एक ही ट्यूमर बन कर रह जायेगा लेकिन उनका यह सोचना पूरी तरह गलत था।
इसके बाद कई सारे ट्यूमर उमर को निकलने लगे और डॉ ने इस बिमारी के इलाज की कोई गारंटी नहीं दी। उमर एक मज़दूर थे उनकी 1 पत्नी और 3 बच्चे है। उमर ठीक से खा भी नहीं सकते और कपडे भी नहीं पहन सकते। कभी कभी उमर बहुत ज़्यादा निराश होकर खुद से नफरत करने लगते है और अपने बच्चो को देख कर कहते है कि मैं एक बुरा बाप हूँ जो अपने बच्चो को खुशिया नहीं दे सका।
डॉ कहते है इस बिमारी का नाम न्यूरो-फिबरो-माटोसिस है जिसमे शरीर पर जगह जगह फोड़े निकलने लगते है। उमर थोड़ा भी हिलते है तो यह दर्द करना शुरू कर देते है।
ठीक ऐसी ही कहानी एक दूसरे व्यक्ति शहादत हुसैन की है जो बंगाल से सम्बन्ध रखते है। शहादत भी बचपन में एक साधारण बच्चे ही थे पर समय के साथ साथ यह ट्यूमर निकलते गए और बड़े होते गए। शहादत ने दुनिया से ऑनलाइन के माध्यम से मदद भी मांगी है। इस बीमारी के कारण शहादत नेत्रहीन हो चुके है।
सोर्स : बरक्रोफ्ट टीवी एवं डेली मेल यूके
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