
वृंदावन में पूरे भारत तथा नेपाल से आई कई विधवाएं रहती हैं, दुर्भाग्य की बात है कि पशु में माता को खोजने वाले इस देश में इंसानी मताये बुरी स्थिति में जीवनयापन करती है। इनके जीवन का सहारा दान और भीख है। खुद को हिन्दू हितो का हितैषी कहने वाला कोई भी राजनीतिक दल इनकी फ़िक्र को लेकर दुबला नहीं हुआ जा रहा है ना ही कभी होगा क्योकि यह किसी वोटर लिस्ट में नहीं हैं.

वृंदावन उत्तर प्रदेश के शहर मथुरा में स्थित है। वही उत्त्तर प्रदेश जहां से हिन्दुओ के हितो के कई सुधार हुए और आवाज़े उठी। वही उत्तर प्रदेश जिसने लाल कृष्ण आडवाणी को देश का कद्दावर नेता बनाया आज उसी उत्तर प्रदेश में माँओ की स्थिति दयनीय है। किसी रक्षा दल सरीखे दलों में इनकी हालत में सुधार करने का कोई जोश फ़िलहाल तो दिखता नहीं

इस शहर को राधा और कृष्ण की नगरी माना जाता है. मान्यता है कि हिंदू भगवान कृष्ण का बचपन यहीं गुज़रा था. वृंदावन का अर्थ है तुलसी का वन. यह मंदिरों का शहर है. यहां के कई मंदिर बहुत विख्यात हैं. लेकिन राधा और कृष्ण की यह नगरी आज विधवाओं की नगरी बनती जा रही है

यहाँ के प्रसिद्ध बांकेबिहारी मंदिर के आसपास के इलाक़ा से लेकर इस्कॉन मंदिर तक का जो इलाका आपको दिखे वहा आपको माथे पर तिलक लगाए सैकड़ों उम्रदराज़ विधवाएँ नज़र आ जाएंगी। यह सभी विधवाएं वैसे तो कृष्णभक्त होती है लेकिन इनमें से बहुत सारी विधवाएं ऐसी हैं जो अपनी इच्छा से यहां नहीं आईं हैं. यह सभी परित्यक्ताएं हैं। जो या तो अकेले होने के कारण या घरवालों के ख़राब बर्ताव से परेशान होकर यहां आईं.

इनमे कई ऐसी भी है जिनको उनके अपने ही बेटे सारी संपत्ति हड़पने के बाद यहाँ लाकर छोड़ गए है। यहां के मां धाम में रहने वाली 82 साल की जमुनाबाई पांडे मध्यप्रदेश के बिलासपुर की हैं. वह घर-बार छोड़कर वृंदावन का पता पूछते-पूछते यहां पहुंच गईं. इनके पति की मृत्यु के बाद घर में उनका सिर्फ़ एक ही बेटा था, जिसकी बदसलूकी के कारण उन्हें घर छोड़ना पड़ा। ये विधवाएं वृंदावन के किसी आश्रम में अपनी बाक़ी ज़िंदगी काटती हैं या फिर किसी किराए के मकान में रहती हैं.

अधिकतर विधवाओं के परिवार में या तो कोई सदस्य नहीं है या फिर उनके परिवार वाले उनको बोझ समझे है और अपने साथ रखने को तैयार नहीं हैं। वृंदावन के एक व्यापारी शर्मा जी बताते हैं कि भजन-कीर्तन करने वाली विधवाओं को बदले में टोकन मिलते हैं. यह टोकन पांच रुपए से लेकर 50 रुपए तक के मूल्य के होते है. विधवाएं इन टोकनों से आसपास की किसी भी दुकान से अपनी ज़रूरत का सामान खरीद लेती हैं जहां से दुकानदार इन टोकनों को उनसे लेकर मालिकों से पैसे ले लेते हैं।

यहाँ ऐसे कई आश्रम हैं जहां प्रतिदिन सुबह और शाम भजन-कीर्तन होते हैं. ऐसे में यही भजन कीर्तन इन विधवाओं के लिए तथा ऐसे आश्रम जीविका चलाने का सहारा होते हैं। बड़ी तादद में ये विधवाएं विभिन्न आश्रमों और मंदिरों में भजन-कीर्तन करती हैं और इसके एवज़ में उन्हें शाम को कुछ भोजन मिल जाता है.


कोलकाता, पश्चिम बंगाल से से आई रामरानी बिस्वास किराए के मकान में रहती हैं और रोज़ भजन करने किसी आश्रम में जाती है। भजन कीर्तन करने के साथ-साथ जीविका चलाने के लिए रामरानी दिन में तीन घरों में चौका बर्तन करतीं हैं। मिथिलेश सोलंकी 88 वर्ष की है वह मध्यप्रदेश के विदिशा से आई है। वह भी विधवा आश्रम में रह रहीं हैं. मिथिलेश को सांस लेने में दिक़्क़त होती है, बढ़ती उम्र और सिर पर किसी परिजन का हाथ न होने का दर्द उन्हें रह-रहकर सताता है.

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इन विधवाओं के लिए आमदनी का एक दूसरा रास्ता भी है और वह वृद्धावस्था पेंशन है। सरकारी आश्रम में रहने वाली विधवाओं को दो हज़ार रुपए मिलते हैं जिनसे इनका ख़र्च चलता है। ज़्यादातर विधवाओं के लिए चुनाव वगैरह का कोई ख़ास मतलब नहीं है क्योंकि अधिकांश विधवाओं के पास वोटर आई डी कार्ड नहीं है


जिन गिनी-चुनी विधवाओं के पास मतदाता पहचान पत्र हैं, उन्हें भी चुनाव से कुछ लेना देना नहीं रहता भजन-कीर्तन, सरकारी पेंशन के बाद भी कुछ विधवाओं को आर्थिक तंगहाली के कारण पेट पालने के लिए भीख मांगनी पड़ती है.


सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक एक स्थानीय अख़बार में छपी ख़बर के हवाले से कहते हैं कि विधवाओं के जीवन का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि उनकी मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार नहीं किया जाता. उनके शव को यमुना में फेंक दिया जाता है.

बिंदेश्वर पाठक मानते हैं कि बहुत सी विधवाओं को ठीक से खाना नहीं मिलता और वो भीख मांगने के लिए मजबूर हो जाती हैं. सुलभ इंटरनेशनल ने वृंदावन की क़रीब एक हज़ार विधवाओं की देखभाल का काम शुरू किया है.
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