
एक समुदाय जिसके दम पर भारत की आधी अर्थव्यवस्था दौड़ती है आज अपने मूलभूल ज़रूरतों के लिए भिखारी बनने पर मजबूर है। 2014 से पहले का विपक्ष जो किसानो के लिए लड़ते लड़ते सड़को पर आधा हो जाता था आज सत्ता में है और सत्ता में आने के बाद अपने मुखारबिन्द से इन किसानो के लिए "चूं" भी नहीं बोल रहा है।
मोदी सरकार के आने के बाद खुद किसान समुदाय को इस बात की आशा थी कि "अच्छे दिन" आयेंगे और कम से कम आत्महत्याओं पर रोक लगेगी लेकिन आपको जानकर हैरानी (नहीं) होगी कि 2014 से अब तक किसानो की आत्महत्या में 42 % की बढ़ोतरी हुई है। नोटबंदी , जो हमारी अर्थव्यवस्था को बुलंदियों पर लेजाने वाली थी , ने किसानो को कही का नहीं छोड़ा। सूदखोर, जिनसे किसानो ने मोटे ब्याज पर पैसा लिया है वह किसानो से लगातार नकदी में ब्याज की मांग कर रहे है।
स्थानीय सूदखोर ही इन किसानो के दुश्मन नहीं बल्कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक वर्ष 2015 में 2474 उन किसानो ने आत्महत्या की है जो बैंक तथा माइक्रो फाइनेंस संस्थानों के उधार और ब्याज के मकड़जाल में फसे हुए थे।
इससे लड़ने के लिए किसानो ने विरोध प्रदर्शन किया लेकिन हालात और बिगड़ गए। विरोध कर रहे किसानो पर गोलिया चलाई गयी जिसमे कई किसान मारे गए। हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री महोदय जी को इतना समय मिल गया कि मैनचेस्टर हमले के पीड़ितों के लिए ट्वीट कर सके लेकिन अफ़सोस देश के ही किसान उनका ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पाए। आइये देखते है कि किसानो की मांग क्या है और बदले में उनको मिल क्या रहा है।
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किसानो की मांगे क्या है ?Pained by the attack in Manchester. We strongly condemn it. Our thoughts are with the families of the deceased & prayers with the injured.— Narendra Modi (@narendramodi) May 23, 2017
अलग अलग राज्यों में अलग अलग तरीके से विरोध प्रदर्शन हुए जिसमे लगभग एक सामान ही मांगे उठाई गयी। यह मांगे थी कि किसानो का उधार माफ़ कर दिया जाए , अकाल पीड़ितों को मुआवज़ा दिया जाए और मिनिमम सप्पोर्ट प्राइस को बढ़ाया जाए। यह सभी किसान देशभर के 162 ज़िलों में (जी हां 162 ज़िलों में , दुनिया में केवल भारत पाकिस्तान का मैच ही नहीं चल रहा है यह भी चल रहा है ) शांतिपूर्वक तरीके से प्रदर्शन कर रहे है। ऐसे ही एक प्रदर्शन, जो मंदसौर में हो रहा था, में आंदोलन हिंसक हो गया और 5 किसानो को गोली लग गयी। किसान कहते है पुलिस ने मारी जबकि पुलिस कहती है कि उन्होंने नहीं मारी, खैर जांच चल रही है
बदले में क्या मिला?
देश के तीन राज्यों , जहां आंदोलन ने बड़ा रूप लेलिया यानी महाराष्ट्र , मध्यप्रदेश और तमिलनाडु में से तमिल नाडु में 2 महीने के लिए आंदोलन को रोक लिया गया है। मुख्यमंत्री पलानिस्वामी ने तय समय में किसानो की मांगे पूरा करने का वचन दिया है।
महाराष्ट्र में , मुख्यमंत्री देवेंदर फडणवीस ने भी छोटे किसानो का लोन माफ़ करने का आदेश दिया है लेकिन अभी भी आंदोलन पूरी तरह से शांत नहीं हुआ है।
मध्यप्रदेश में अभी कोई वादा नहीं किया गया है। वहा तो ऐसा कुछ हुआ तो अपने आप में हास्यास्पद है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह धरने पर बैठ गए। जिस व्यक्ति के पास राज्य में सबसे ज़्यादा शक्ति हो , जिसकी पार्टी को देश ने बहुमत देकर प्रधानमंत्री पद दिया हो वह आदमी अनशन पर बैठ गया। फिर दो दिन में अनशन यह कहकर खत्म कर लिया कि किसानो ने सपने में आकर उनसे कहा है कि आप अनशन बंद कर दे। वैसे अब उनके लिए समय सपने देखने का नहीं बल्कि कुछ करने का है।
केंद्र सरकार ने भी साफ़ कर दिया कि राज्यों के किसानो का लोन राज्य सरकार ही माफ़ करे। अपनी हार का ठीकरा अब भाजपा मौसम और कांग्रेस पर मढ़ रही है। केंद्र सरकार को नोटबंदी के कारण जन्मी परेशनियो से ज़्यादा चिंता इस बात की है कि राहुल गाँधी के किसानो से मिलने से हालात खराब हो जायेंगे। इस पूरे मुद्दे पर जो बात सबसे ज़्यादा दुखद है वह यह कि हमारे अपने सबके चाहते श्रीमान नरेंदर मोदी जी चुप है। अपने किसी मास्टर स्ट्रोक से वह किसानो का भला नहीं कर रहे।
किसान अब सरकार से दो चीज़े मांग रहे है कि या तो उनको उनके पुराने सड़े गले और बुरे दिन देदो या जिन अच्छे दिनों का वादा 2014 में किया गया था वो अच्छे दिन देदो। अब समय है प्रधानमंत्री नरेंदर मोदी जी के लिए कि वह अपने कंधो पर ज़िम्मेदारी उठाये और किसानो को बस वह देदे जो किसानो के हितो में हो
सोर्स
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