ऐसे होती है इवीएम से छेड़छाड़ !
नीदरलैंड के मशहूर आईटी एक्सपर्ट रूवॉफ का कहना है कि जो दल चुनाव सॉफ्टवेयर को मैनिपुलेट करेगा वही तय करेगा कि देश पर शासन कौन करेगा। रूवॉफ एक एथिकल हैकर हैं जिन्होंने कुछ साल पहले स्थानीय टीवी चैनल आरटीएल के लिए चुनाव सॉफ्टवेयर ओएसवी की जांच की और छब्बीस खामियों का पता कर लिया। एक अन्य हैकर गोंगग्रिप ने दस साल पहले ही साबित कर दिया था कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को इस तरह टेंपर किया जा सकता है कि स्वतंत्र जांचकर्ताओं को इसका पता भी नहीं चले। रहस्योद्घाटन के बाद नीदरलैंड मशीनों को छोड़कर फिर से चुनाव की परंपरागत विधि पर वापस लौट आया। नीदरलैंड में इस 15 मार्च को संसदीय चुनाव की वोटिंग लाल पेन और कागज से हुई। ज्ञातव्य है कि इवीएम की संदिग्धता के कारण इनका उत्पादन करने वाले जापान और अमरीका सहित कई यूरोपीय देश पारंपरिक तरीके से ही मतदान कराते हैं। भारत में इन ईवीएम मशीनों को इलेक्ट्रॉनिक कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड बनाते हैं। यह काम ये कंपनियां चुनाव आयोग के अधीन न करके केंद्र सरकार के अधीन करती हैं। चुनाव आयोग 1990 और 2006 में एक्सपर्ट्स से इवीएम की जांच करवाने का दावा करता है। उस जांच के बारे में पढ़ने पर बड़ी ही हैरान करने वाली जानकारियां मिलीं। निर्माता कंपनियों ने मशीन के सोर्स कोड एक्सपर्ट्स कमेटी के साथ साझा ही नहीं किए। जांचकर्ता एक्सपर्ट्स को भी कंप्यूटर का कोई खासा ज्ञान नहीं था। अब सवाल यह उठता है कि बिना सोर्स कोड के एक मशीन के सॉफ्टवेयर की सम्पूर्ण जांच कैसे संभव है ? ईवीएम का सॉफ्टवेयर कोड वन टाइम प्रोग्रामेबल नॉन वोलेटाइल मेमोरी के आधार पर बना है। यदि किसी को उनसे छेड़छाड़ करनी हो तो उसे केवल निर्माता से कोड हासिल करना होगा। ईवीएम का सॉफ्टवेयर अलग से रक्षा मंत्रालय और परमाणु ऊर्जा मंत्रालय के यूनिट बनाते हैं जो केंद्र सरकार के ही अधीन हैं। यदि इन सॉफ्टवेयर का सोर्स कोड मालुम हो तो एक विशेष लूप प्रोग्राम डालकर पहले पांच सौ या हजार वोट के सही होने के बाद अपनी मर्जी के हिसाब से उसे चलाना निश्चित किया जा सकता है। हां यदि वीवीपीएटी मशीन लगी हो तो ऐसा किया जाना मुश्किल है क्योकि मतदाता को अपनी पर्ची सात सेकण्ड के लिए जरूर नजर आएगी।
2013 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से हर बूथ पर वीवीपीएटी की व्यवस्था करने को कहा था। चुनाव आयोग इसके लिए लगातार फण्ड की मांग करता रहा है, लेकिन सरकार चुनाव आयोग की इस मांग पर ध्यान नही दे रही है। पैसा मिलने में देरी को लेकर चुनाव आयोग सरकार को जून 2014 के बाद दस रिमाइंडर भेज चुका है। इसके अलावा अक्टूबर 2016 में मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने सीधे प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर इस ओर ध्यान देने का अनुरोध किया था। सुप्रीम कोर्ट में आयोग के खिलाफ मामले को लेकर अवमानना की सुनवाई चल भी रही है। अब धीरे-धीरे केंद्र सरकार का यह खेल और चुनाव आयोग की ऐसी बेचारगी देश समझने लगा है।
(गिरीश मालवीय द्वारा जुटाई गई सूचनाओं के आधार पर)
ध्रुव गुप्त जी एक रिटायर्ड आईपीएस तथा स्वतंत्र लेखक है आप उनका यह लेख उनकी वाल पर पढ़ सकते है
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