सहारनपुर के शाहरक़ाज़ी की अध्यक्षता में छः सदस्यीय कमेटी ने शराब के खिलाफ़ अभियान छेड़ते हुए ऐलान किया है कि कोई भी इमाम अब शराबियों की नमाज़-ए-जनाज़ा नहीं पढ़ाएगा। इसके साथ ही उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि वह शराबियों के जनाज़े में न जाएं।
अगर यह ख़बर सही है तो अफ़सोसनाक है क्योंकि किसी आलिम, इमाम या शाहरक़ाज़ी को अल्लाह के दीन के साथ खिलवाड़ करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती और अगर यह लोग इस क़िस्म का दुस्साहस करते हैं तो मुसलमानों को चाहिए कि ऐसे लोगों के पीछे नमाज़ पढ़ना छोड़ दें क्योंकि नमाज़-ए-जनाज़ा फर्ज़े किफ़ाया है अर्थात यह ऐसा फ़र्ज़ है जिसको अगर कोई भी अदा न करे तो सभी लोग गुनहगार होंगे और अगर कुछ लोग अदा करें और कुछ लोग छोड़ दें तो छोड़ने वालों पर कोई गुनाह न होगा।
इस तरह किसी फर्ज़े किफ़ाया को छोड़ने की अपील करना पूरी क़ौम को गुनहगार बनाने के समान है।
एक मर्तबा इमाम अबू हनीफ़ा र अ के पास खारजियों की एक जमाअत आई और उनसे पूछा कि मस्जिद के दरवाज़े पर दो जनाज़े हैं। एक ऐसे शराबी का है जो शराब पीते पीते मर गया और दूसरा एक औरत का है जो ज़िना से हामला हुई और शर्म से ख़ुदकुशी करके मर गई। उन्होंने इनकी जनाज़ों की नमाज़ के मुतअल्लिक़ मसला पूछा जिसके जवाब मेँ इमाम साहब ने सवाल किया कि यह दोनों क्या यहूदी थे? उन्होंने कहा नहीं। फिर पूछा क्या ईसाई थे? जवाब मिला नहीं। इमाम साहब ने पूछा कि फिर वह किस मिल्लत से थे? उन्होंने जवाब दिया कि वह उस मिल्लत से थे जो कलमा-ए-इस्लाम की शहादत देती है। इमाम साहब ने पूछा कि यह बताओ कि उनके पास ईमान का एक चौथाई भाग था या एक तिहाई था या आधा था? इसके जवाब में खारजियों ने कहा कि ईमान का तिहाई चौथाई नहीं होता। इमाम साहब ने कहा कि इस कलमे की शहादत को तुम ईमान का कितना हिस्सा मानते हो? वह बोले पूरा ईमान। इस तरह उन खारजियों के सवाल का जवाब खुदबखुद मिल गया कि ईमान रखने वाला शख़्स पूरा मुसलमान होता है और हर मुसलमान का हक़ है कि उसके जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई जाए। जहांतक मरने वालों के जहन्नुमी जा जन्नती होने का तअल्लुक़ है तो इसका हक़ तो सिर्फ़ अल्लाह ही को है कि वह उनके साथ क्या मामला करे।
इस तरह किसी मुसलमान की जनाज़े की नमाज़ पढ़ाने से इंकार करने वाले आलिमों से बचना चाहिए।

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