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    Tuesday, 11 April 2017

    यह है बेहरिक एरकिन जिन्होंने बचाया था हज़ारो यहूदियों को हिटलर के कहर से



    आपने कार्ल लुट्ज़ और ऑस्कर श्चिण्डलेर का नाम सुना होगा, इन दोनों ने होलोकॉस्ट के समय कई यहूदियों की जिंदगी बचाई थी लेकिन क्या आपने कभी उस तुर्किश व्यक्ति के बारे में सुना है जिसने फ्रांस में 20000 से ज़्यादा यहूदियों को बचाया था।

    वो व्यक्ति था बेहिक एरकिन। बेहिक उस समय फ्रांस में तुर्की के दूत थे। एरकिन ने हज़ारो यहूदियों को नागरिक दस्तावेज़ और पासपोर्ट उपलब्ध कराये थे। उस वक़्त यहूदियों के ऊपर नाज़ियों द्वारा बंधक बनाये जाने और हिटलर के बदनाम डिटेंशन सेंटर में रखे जाने का खतरा था। एरकिन ने ज़्यादा से ज़्यादा यहूदियों की मदद करके फ्रांस से तुर्की रवाना करा दिया।

    तुर्की की एम्बेसी ने बिना किसी नस्लीय भेदभाव के हमेशा अपने नागरिको की मदद की। शुरूआती दिनों में नाज़ी फ़ौज यहूदियों से जबरन उनके व्यवसायिक बोर्ड्स और खिड़कियों पर 'यहूदियों द्वारा स्वामित्व' लिखवा रही थी जिससे कि उनका बायकॉट और धरपकड़ करने में आसानी हो।

    इससे बचने के लिये तुर्की एम्बेसी ने तुर्किश यहूदियो से कहा कि वह अपने बोर्ड्स पर " तुर्की नागरिक" भी लिखे ताकि नाज़ी फ़ौज तुर्की देश के नागरिक होने के कारण तुर्किश यहूदियों पर अत्याचार न करे क्योकि युद्ध में तुर्की एक न्यूट्रल देश था साथ ही तुर्की के राजदूत ने किसी भी यहूदी के तुर्की से छोटे से कनेक्शन होने पर भी नागरिकता प्रदान करने की घोषणा कर दी।

    युद्ध के समय तुर्की के अधिकारियो ने तुर्किश यहूदियो को बचाने के लिए जर्मनी से बातचीत की भरपूर कोशिश की कि तुर्की के नागरिको को न सताया जाये।

    इसके बाद जब ज़ेवियर वॉलेट को फ्रांस में ज्यूइश अफेयर का हेड कमिश्नर चुना गया तब एंटी सेमितिस्म यानी यहूदियों से नफरत का माहौल बढ़ गया। इसके कुछ वर्षो में नाज़ी फ़ौज फ्रांस में फ़ैल गयी और हाल ही में आये यहूदी प्रवासियों को डिपोर्ट करने लगे। फिर उनको जो 1933 के बाद फ्रांस आये थे और आखिर में फ़्रांस के यहूदियों को, जो सदियो से रह रहे थे, डिपोर्ट करने लगे।

    1942 के अंत में जर्मन नाज़ियों ने एक योजना बनाई कि ऐसे देशो के यहूदियो को उनके मूल देश जाने दिया जाए जिनके देश युद्ध में लिप्त नहीं है। एरकिन को अब एक मौक़ा मिल गया। उन्होंने जल्दी से एक रेल का बंदोबस्त कराया जो यहूदियों को तुर्की ले जाने के लिए थी।

    यहाँ गौर करने की बात यह है कि ऐतिहासिक दस्तावेज़ यह कहते है कि तुर्की सरकार इन सबमे लिप्त नहीं थी लेकिन तुर्की सरकार के कुछ अधिकारी अपने जोखिम पर यहूदियों को बचा रहे थे।


    जब यह खबर आई कि ट्रेन चलने वाली है, बड़ी संख्या में यहूदी तुर्की की नागरिकता लेने कंसोलेट दफ्तर के बाहर पहुँचे। यह बहुत जोखिम भरा था क्योकि तुर्की एक छोटे से लिंक पर भी यहूदियों को नागरिकता प्रदान कर रहा था। नाज़ियों को भनक लग जाती तो पूरा प्लान रुकवा सकते थे या वहीँ से यहूदियों को गिरफ्तार कर लेते क्योकि कुछ यहूदी ऐसे थे जिनका तुर्की से कोई सम्बन्ध नहीं था ऐसे में तुर्की और फ्रेंच यहूदी दोनों के लिए खतरा था।

    लेकिन एरकिन ने जोखिम लिया उन्होंने अपने अधिकारियो से कहा कि हर यहूदी की मदद की जाए।

    एरकिन ने रेल में तुर्की के बड़े बड़े झंडे लगवा दिए जिससे उस ट्रेन की सुरक्षा और बढ़ गयी क्योकि नाज़ी तुर्की नागरिको और वाहनों को हर नाके से आसानी से जाने दे रहे थे।

    इन यात्रियों में एक यात्री पूर्व फ्रेंच प्रधान मंत्री लीओन ब्लम का बेटा था जिसने एरकिन को पत्र लिखा था जो आज भी यूनिवर्सिटी ऑफ़ अंकारा, तुर्की में रखा हुआ है।

    कितने यहूदियों को एरकिन ने बचाया था इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है लेकिन कुछ आंकड़े कहते है यह 20 हज़ार के आस पास थे। संख्या कितनी भी हो एरकिन के इस हिम्मतवाले प्रयास के लिए उनको याद और सराहना अवश्य की जानी चाहिए जो उन्होंने उस समय हिटलर की फ़ौज के खिलाफ अपने जोखिम पर उठाये थे।

    एरकिन ने ना केवल खुद यहूदियों को बचाया बल्कि उन्होंने यूरोप के सभी तुर्किश अधिकारियो से आग्रह किया था कि जितने यहूदियों को कैसे भी करके बचाइये।

    एरकिन ने एक सच्चे मुस्लिम होने की मिसाल कायम की उन्होंने इंसानी मूल्यों को देश और अन्तरष्ट्रीय कानून से ऊपर रखा, अपने देश के कानून तोड़कर हर उस यहूदी को तुर्की की नागरिकता और पासपोर्ट दिया जो उनके पास मदद के लिए आया।

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