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    Friday, 21 April 2017

    मेरे बाद कोई नबी होता तो उमर होता : पैगम्बर मोहम्मद SAW



    हाँ हाँ ! यह कोई और नहीं मेरे नबी जनाब ए मुहम्मद रसूलल्लाह सल्ल॰ फ़रमा रहे हैं " बेशक मेरे बाद कोई नबी होता तो उमर होता "
    हाँ वही उमर बिन ख़त्ताब रज़ि॰ जिनके बदन पर 12 रफ़ू किए हुए कपड़े होते, जिनके सर पर फटा हुआ अमामा होता और पाँव में फटी हुई जूतियाँ होती
    हाँ वही उमर बिन ख़त्ताब रज़ि॰ जो अक्सर कहा करते थे के मेरे सल्तनत में अगर कुत्ता भी प्यासा मर गया तो मैं अपने रब को क्या मुँह दिखाऊँगा
    हाँ वही उमर बिन ख़त्ताब रज़ि॰ जो रोते जाते और कहते जाते के " ए उमर तू कुफ़्फ़ार था, ज़ालिम था, बकरियाँ चराता था तेरे रब ने तुझे दीन की दौलत से माला माल किया और मोमिनों का ख़लीफ़ा बनाया क्या तू अपने रब के एहसानों को भूल गया क्या तू यह समझ बैठा के तू मरेगा नहीं
    हाँ वही उमर बिन ख़त्ताब रज़ि॰ जिसे मेरी नबी ने माँगा " या अल्लाह मेरे इस्लाम की बुलंदी के लिए मुझे बस उमर देदे "
    हाँ वही उमर बिन ख़त्ताब रज़ि जिसे मेरे नबी ने उन्हें अपना कान माना तो अबू बकर रज़ि॰ को अपना आँख
    हाँ वही उमर बिन ख़त्ताब रज़ि॰ जिसे मेरे नबी ने एलान किया के " अख़िरत में उमर और अबू बकर मेरे साथ होंगे "
    हाँ वही उमर बिन ख़त्ताब रज़ि॰ जिन्हें मेरे नबी ने जन्नत की बशारत पहले ही दे दी पर जब उनका वफ़ात का वक़्त आया तो हज़रत अली रज़ि॰ ने उनके चेहरे के तरफ़ देखते हुए पुछा " ए उमर मौत से डर गए क्या ? नहीं नहीं मौत से नहीं डरा बल्कि मौत के बाद क्या होगा उससे डर रहा हूँ
    हाँ वही उमर बिन ख़त्ताब रज़ि जब आख़री वक़्त में उनका दम निकलने लगा तो ज़मीन की मिट्टी पर मुँह रगड़ कर कहने लगें " ए उमर आज तेरे रब ने तुझे मुआफ़ नहीं किया तो तू हलाक हो गया "

    देखो देखो यह मेरे अमीरुल मोमिनीन का हाल था मेरे नबी सल्ल॰ के चहेते का हाल था इतनी अज़ीम हस्ती का यह हाल था और तुम उनपर बोहतान बाँधते हो उनपर तोहमत लगाते हो...ज़ुबान कट जाए हलाक हो जाए वो शख़्स जो उमर फ़ारूक़ रज़ि॰ से बग़ज रखता हो,
    सुनो सुनो ! यह तो इस्लाम की तारीख़ गवाही दे रही है उस अज़ीम शख़्स पे अगर हिंदुस्तान की तबारीख़ पलट कर देखो तो यहाँ के महात्मा यानी गांधी जी ने भी कहा था के " मैं तमाम देशवासियों को सादगी की ज़िन्दगी गुज़ारने का मशवरा देता हूँ और मैं इस सादगी के मिसाल के लिए ख़लीफ़ा " अबू बकर रज़ि और उमर फ़ारूक़ रज़ि का " नाम पेश करता हूँ बेशक वो बहुत बड़े सल्तनत के हकीम थे पर उन्होंने फ़क़ीरों वाली ज़िन्दगी गुज़ारी और हक़ व अदल के साथ इंसाफ़ किया ।

    अरे क्या भूल गए वो मुक़ाम ए इब्राहिम जो उनके रब ने उनकी खवाइश पर वहाँ नमाज़ पढ़ने की जगह ही मुक़र्रर कर दी ? या वो सूरह तौबा की आयत उनके रब तरफ़ से नाज़िल होना या उनके ख़यालात पर सूरह नूर की आयत नाज़िल होना...अरे जिसका रब उससे राज़ी हो जिसका रसूल उससे राज़ी हो जिसकी गवाही इस्लाम दे रही हो तुम उससे बग़ज रखते हो तुम उसपे तोहमत लगाते हो तो याद रहे तुम उसपे नहीं अल्लाह और उसके रसूल सल्ल॰ पर तोहमत लगाते हो तुम अल्लाह और उसके रसूल पर बोहतान बाँधते हो, साफ़ साफ़ कहूँ तो तुम इस्लाम के पैरोकार ही नहीं बल्कि तुम अपने ईमान में झूठे हो तुम दीन ए इस्लाम के दुश्मन हो ॥

    #मेरी_जान_क़ुर्बान_उमर_फ़ारूक़_रज़ि_आप_पर

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