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    Monday, 13 March 2017

    यहाँ करते है लोग सांस लेने के लिए संघर्ष , नागरिको के साथ सैनिको को भी फंसाया जाता है फ़र्ज़ी मुकद्दमे में


    आज बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता है जो जो ज़मीन से जुड़ कर काम कर रहे है।  कुछ ऐसे भी है जो सोशल मिडिया के माध्यम से जागरूकता लारहे है लेकिन ऐसे बहुत कम कार्यकर्ता है जो ज़मीन और सोशल मिडिया दोनों पर एक्टिव है और ऐसे ही एक कार्यकर्ता है हिमांशु कुमार जो अभी हाल ही में अपनी साइकिल यात्रा करके लौटे है।

    आज उन्होंने राजस्थान के पत्थर उद्योग का एक काला सच दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जिसमे उन्होंने बताया कि कैसे सरकार , व्यापारी और पुलिस नागरिको के अधिकारों का हनन करके लाभ कमाते है।  अफ़सोस की बात है सुप्रीम कोर्ट के मना करने के बाद भी पत्थर की तुड़ाई जारी है जिससे प्राणघातक बिमारी फ़ैल रही है।

    जानिये हिमांशु भाई के फेसबुक पोस्ट द्वारा





    यदि आप कभी राजस्थान में राजसमंद से जयपुर वाली सड़क से आएंगे तो आपको संगमरमर की बड़ी चट्टान लाद कर जाते हुए ट्रक दिखाई देंगे,
    अगर आप सड़क छोड़ कर थोड़ा अंदर की तरफ जाएं तो आपको इन चट्टानों को चीरने वाली मशीनें और कारखाने मिलेंगे,
    यह पूरा इलाका पत्थर के व्यापार का इलाका है आपने भी अपने घर में इस तरह के पत्थर जरूर लगाए होंगे,
    पत्थरों को पहाड़ में से खोदना और उसका व्यापार करना बहुत मुनाफे का धंधा है, यह अरबों रुपए का धंधा है,
    पत्थर खोदने वाले और उसे तराशने वाले लोगों को एक बीमारी हो जाती है,
    पत्थर के छोटे-छोटे कण उनके फेफड़ों में जम जाते हैं,
    इस बीमारी का नाम सिलिकोसिस है,
    सिलिकोसिस का कोई इलाज नहीं है, एक बार सिलिकोसिस हो जाने पर मरना तय है,
    मैंने अपनी साइकिल यात्रा में ऐसा गांव भी देखा जिसमें 60 लोग सिलिकोसिस से मर चुके हैं,
    उस गांव में 60 विधवाएं हैं कई परिवारों में तो तीन पीढ़ी इस बीमारी से मर चुकी है और परिवार में तीन विधवा महिलाएं हैं,
    वैसे तो पूरी अरावली पर्वतमाला में किसी भी तरह की खुदाई पर मनाही है,
    सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाई हुई है,
    लेकिन आप राजस्थान में पहाड़ों को खुलेआम खोदा जाते हुए देख सकते हैं,
    सिलिकोसिस की बीमारी सिर्फ पत्थरों का काम करने वाले लोगों को ही नहीं होती है,
    उस इलाके में रहने वाले आम लोगों को भी यह बीमारी हो जाती है,
    सुक्लाबास गांव में हमारे दोस्त राधेश्याम ने साठ लोगों का यूं ही परीक्षण करवाया तो उनमें से 6 लोगों को सिलिकोसिस निकली,
    यानी दस प्रतिशत लोग मरने के लिए मजबूर हैं,
    यहां लोग सिर्फ सांस लेने और जिंदा रहने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं,
    पत्थरों को खोदने के लिए बारूद का इस्तेमाल किया जाता है इससे पत्थर उछलते हैं और लोगों के घरों पर गिरते हैं,
    धमाकों से लोगों के घरों में दरारे आ जाती है और लोगों के घर टूट गए हैं,
    पत्थरों के ट्रकों से सड़कें टूट गयी हैं, बसों का चलना बंद हो चुका है,
    हर हफ्ते एक ना एक मौत पत्थरों के ट्रकों के नीचे कुचलने की वजह से होती है,
    पहलवानों की एक दलित बस्ती में एक व्यक्ति ने बताया कि हमारा एक साथी ट्रक से कुचल कर मर गया था,
    जब बस्ती वाले पुलिस कार्यवाही की मांग कर रहे थे तो पत्थर के व्यापारी ने आकर बस्ती के मुखिया से कहा कि मेरी मशीने पत्थर पीसती हैं, तुम लोगों को पीसने में कितनी देर लगेगी ?
    फसलें बर्बाद हो चुकी हैं, फसलों पर पत्थरों की धुल जम जाती है,
    पुलिस और सरकार इन पत्थरों के व्यापारियों के साथ मिलकर काम करती है,
    जो कोई भी पत्थरों के कारण होने वाले तकलीफों के बारे में आवाज उठाता है पुलिस उस पर फर्जी मुकदमे लगा देती है और पिटाई करती है,
    पत्थरों के व्यापारियों के पास हथियारबन्द गुण्डों की फौज होती है,
    अपने खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को ये लोग डराते हैं और मार डालते हैं,
    पचेरी गांव में प्रदीप शर्मा को पत्थरों के व्यापारियों ने मार डाला,
    सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीणा को पत्थर के व्यापारियों के खिलाफ आवाज़ उठाने के कारण पुलिस ने दिसम्बर की सर्दी में नंगा करके रस्सी से बांघ कर गांव में घुमाया ताकि कोई आइन्दा आवाज़ उठाने का साहस ना कर सके,
    पत्थर के व्यापारियों की गैर कानूनी हरकतों के खिलाफ अनेकों पूर्व सैनिक भी संघर्ष कर रहे हैं,
    लेकिन पुलिस इन सैनिकों को भी पीटती है और फर्जी मुकदमों में फंसा देती है,
    कारगिल युद्ध में दो गोली खाकर वीर चक्र विजेता जयराम ने जब पत्थर व्यापारियों के दो ट्रक भरे हुए अवैध बारूद की शिकायत करी तो पुलिस ने जयराम के ऊपर फर्जी मुकदमे लगा दिए और जयराम को छुप कर रहना पड़ा,
    रामकुमारपुरा गाँव में सैनिक के छोटे बच्चे के हाथ की अंगुलियाँ पत्थर के व्यापारियों के अवैध बारूद से उड़ गयी लेकिन पुलिस नें आज तक उनकी रिपोर्ट भी नहीं लिखी,
    गाँव का पानी ज़हरीला हो चुका है,
    पत्थर व्यापारियों के गुंडों की वजह से लड़कियों ने पढ़ाई छोड़ दी है,
    लोग अपनी पूरी ताकत से विरोध तो कर रहे हैं,
    लेकिन सरकार, पुलिस और पत्थर व्यापारियों के गुंडों के कारण लोग अपनी ज़िन्दगी को दूभर होने से नहीं बचा पा रहे हैं,
    सरकार जनता के दुश्मन की तरह बर्ताव कर रही है,
    हमें जल्द ही कोई रास्ता खोजना होगा,
    यह इलाका मर रहा है,
    कुछ लोगों की अय्याशी के लिए लाखों लोगों को तडपा तडपा कर मारने वाले समाज को जल्द ही ठीक करने की ज़रूरत है,

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