मैं पूजास्थलों पर बहुत कम जाता हूं लेकिन आप मुझे नास्तिक न समझें। मुझे मंदिर, चर्च, गुरुद्वारे, मस्जिद और सभी पूजास्थल बहुत अच्छे लगते हैं। मैं इन स्थानों का दिल से सम्मान करता हूं। पिछली बार मैं मंदिर गया तो वहां भगवान के जयकारों के साथ एक और चीज पर मेरा ध्यान गया। दीवार पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था- जेबकतरों से सावधान!
यह बात सिर्फ मंदिरों तक सीमित नहीं है। अगर जेबकतरा चर्च, मस्जिद या गुरुद्वारे में पहुंच जाए तो वहां भी बेखौफ होकर हाथ आजमा सकता है। मैं बेखौफ शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहा हूं क्योंकि खुदा हो या भगवान - अब हम किसी से नहीं डरते।
जब मैं दफ्तर से घर लौटता हूं तो हर बस में मुझे लिखा दिखाई देता है- जेबकतरों से सावधान! यात्री अपने सामान की स्वयं सुरक्षा करें। ये तमाम बातें पढ़कर मैं सोचता हूं - क्या हम लोग डकैतों के किसी झुंड में फंस गए हैं या हम खुद ही डकैत हैं? हर जगह चोरी-बेईमानी का शोर क्यों है? भ्रष्ट सरकारी दफ्तरों और बेईमान पुलिस थानों की तो अब बात ही न करें। इनसे तो वह कोठा ज्यादा पवित्र है जहां तवायफ लेन-देन के मामले में काफी ईमानदार होती है।
हुजूर, छोड़ें इनकी बात। हम भारत के लोग बेईमानी के मामले में खुदा और भगवान के घर को भी नहीं बख्शते। जेब काटना, चप्पल-जूते चुराना, औरतों के जेवरात तोड़ भागना, उठाईगिरी, मिलावट जैसे जुर्म हम मंदिर के नजदीक भी निडर होकर करते हैं और मस्जिद के करीब होकर भी बेखौफ होकर अंजाम देते हैं। ऐ हिंदुस्तान के लोगो! दिल पर हाथ रख सच-सच बताना, हम दिन-रात राम और रसूल (सल्ल.) की चर्चा सबसे ज्यादा करते हैं, लेकिन असल जिंदगी में उनकी बातों पर अमल कब करते हैं?
हमारे लिए गीता और कुरआन सिर्फ धार्मिक पोथियां बनकर रह गई हैं। असल में ये क्रांतिकारी किताबें हैं। हमने इन्हें सिर्फ माथे से लगाने और चूमकर अलमारी में रख देने की चीजें समझ रखा है। सच कह रहा हूं, आज सुबह से बहुत दुखी और बहुत शर्मिंदा हूं। जब से मैंने तमाम न्यूज वेबसाइट पर एक खबर पढ़ी।
खबर कुछ यूं थी कि एशिया में एक देश ऐसा है जिसकी राजधानी सबसे ज्यादा ईमानदार है। शुरुआत में मैंने अंदाजा लगाया कि शायद दिल्ली का नाम होगा, क्योंकि वहां मोदीजी रहते हैं। अब तो उधर केजरीवाल साहब हुकूमत चला रहे हैं। दोनों ने मिलकर इस शहर को ईमानदार बना दिया होगा। कई सालों से डॉ. मनमोहन सिंह वहीं विराजमान हैं। उन्होंने अर्थशास्त्र का कोई अचूक नुस्खा समझा दिया होगा।
मगर मेरा अंदाजा गलत निकला। यह हमारी राजधानी दिल्ली नहीं, बल्कि जापान का टोक्यो शहर था। इस शहर की पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि हर साल टोक्यो में अरबों रुपए का सामान खो जाता है। लोग बस, ट्रेन, हवाईअड्डों और सार्वजनिक जगहों पर अपना कीमती या मामूली सामान भूल जाते हैं।
जब किसी को यह मिल जाता है तो वह सीधे पुलिस को सौंप देता है। इसके बाद पुलिस असली हकदार तक वह चीज पहुंचा देती है। ताज्जुब की बात यह है कि ऐसे मामलों में करीब तीन चौथाई सामान असली हकदार को मिल ही जाता है।
यह पढ़कर मुझे मन ही मन शर्म का अहसास हुआ, वहीं जापान के लिए दिल में आदर पैदा हुआ। छोटा-सा देश है जापान, जहां आए दिन भूकंप-प्राकृतिक आपदाएं दस्तक देती रहती हैं। न जाने ये जापानी किस मिट्टी से बने हैं! हर बार गिरकर उठ जाते हैं, ज्यादा हिम्मत के साथ कदम बढ़ाते हैं।
दूसरे महायुद्ध में अमरीका ने इस मुल्क को राख का ढेर बना दिया था लेकिन यहां इंतकाम के नारे नहीं गूंजते। कोई इन्हें जिहाद या धर्मयुद्ध के लिए नहीं भड़काता। यहां कोई नहीं कहता कि हम हजार साल तक जंग करेंगे, चाहे हमारे बच्चे घास खाएं। ये लोग कभी नहीं कहते कि हम अमरीका के टुकड़े-टुकड़े कर देंगे। आज तो अमरीका इनका दोस्त है। कोई नेता अथवा गुरु इन्हें नहीं भड़काता कि तुम्हें खतरा है, जबकि जापान की सीमाएं बहुत ज्यादा खतरों से घिरी हैं। सनकी तानाशाह किम जोंग उन इनके बगल में ही रहता है।
मैं नहीं जानता कि ये लोग सफर से पहले दुआ करते हैं या नहीं, लेकिन इनकी बसें-ट्रेनें बिल्कुल सही वक्त पर आती हैं और सुरक्षित पहुंचा देती हैं। मैं नहीं जानता कि जापानी दिन में कितनी बार पूजास्थलों में जाते हैं, वे किस खुदा की इबादत करते हैं, वे कितने ईमान वाले हैं, वे कितने बड़े भक्त हैं, मगर ये कभी पूजास्थलों की जमीन के लिए नहीं लड़ते। यहां से धार्मिक आतंकवाद की कोई खबर नहीं आती। कभी बम नहीं फटते। बिल्कुल शांत और सुरक्षित देश है।
मैं नहीं जानता कि जापान के बच्चे हर सुबह स्कूलों में कौनसी प्रार्थना करते हैं लेकिन इतना जानता हूं कि इन्हें ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। बार-बार सिखाया जाता है कि किसी का खोया हुआ सामान मिले तो उसे जरूर लौटा दो। ऐसा देश अगर सौ बार उजड़ भी जाए तो ईमानदारी की ताकत उसे फिर आबाद कर देगी।
यहां कोई बात-बात पर देशभक्ति के सर्टिफिकेट नहीं मांगता, पर इन लोगों की देशभक्ति दुनिया के लिए नजीर है। यहां कोई धर्मगुरु न तो फतवे मारता फिरता है और न ही किसी खाप पंचायत का कोई जोर है। आज जापान की तकनीक का पूरी दुनिया में डंका बज रहा है और इसके पीछे किसी की सिफारिश नहीं, सिर्फ इन लोगों की मेहनत है।
मैं इस दुनिया को खुदा का एक बाग समझता हूं। जो इसे सजाएगा, संवारेगा, इसकी हिफाजत करेगा, उसी से खुदा राजी होगा। वह उसे ताकत देगा और दुनिया उसकी इज्जत करेगी। इसके उलट, जिसकी दिलचस्पी तोड़-फोड़ में होगी, जो छोटी-छोटी बातों पर बखेड़ा पैदा करेगा, घर, बाजार, दुकानों में आग लगाएगा, जो औरतों, बच्चों, बूढ़ों पर रहम नहीं करेगा, वह चाहे जितने जोर से अल्लाहो अकबर के नारे लगाए या श्रीराम की जय-जयकार कर ले ... दुनिया में ऐसे लोग मारे-मारे फिरते रहेंगे।
चाहे वे करोड़ों की तादाद में ही क्यों न हो जाएं, कोई उनकी इज्जत नहीं करेगा। वे मन में खुद को शेर समझने का भ्रम पाल लें, पर दुनिया के सामने उनकी औकात भेड़-बकरियों से ज्यादा नहीं होगी। मुझे अफसोस है, हम लोगों के साथ आज यही हो रहा है।
मुझे नहीं मालूम कि कयामत के रोज खुदा मुझसे क्या पूछेगा। मुझे डर है, कहीं यह न पूछ ले - मैंने गीता और कुरआन तुम्हें दी, फिर सबसे ज्यादा अनपढ़ तुम्हारे मुल्क में क्यों? मैंने सबसे ज्यादा ईमान तुम्हें दिया, फिर सबसे ज्यादा बेईमान तुम्हारे मुल्क में क्यों? मैंने बहुत बड़ी जमीन तुम्हें दी, फिर तुम्हारे घरों के बीच सरहदें क्यों? मैंने बहुत बड़ा दिल तुम्हें दिया, फिर भी अपनों के गले काटे! आखिर क्यों?
Writer Rajeev Sharma
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