भारत पिछले कुछ दशको में बदला है। भारत ने उन्नति भी है और दुनिया में भारतीयों ने झंडे भी गाड़े है। आज भी अमेरिका के टॉप बिज़नस घरानों में भारतीय सीईओ काबिज है लेकिन पिछले कुछ सालो में क्या आपको नहीं लगता राजनैतिक और नैतिक रूप से भारत काफी बदल गया है ? पहले जहाँ पार्टी विशेष अभिव्यक्ति की आज़ादी की सबसे बड़ी चैम्पियन बनती थी उसी के राज में आज मिडिया भी मुँह खोलने से डरने लगी है। क्या यह सच है कि हम और ज़्यादा सांप्रदायिक और जाति वादी हो रहे है। हमारे सामने अख़लाक़ से लेकर ऊना में पीटे गए दलितों के उदाहरण सामने है। माहौल इतना संगीन हो गया था कि खुद प्रधानमंत्री मोदी जी को अपने भाषण में कथित गौ भक्तो को आड़े हाथो लेना पड़ा। फिर चाहे बात जवाहरलाल विश्विद्यालय की हो या दिल्ली विश्विद्यालय की , ऐसा लगता है कि हिंसा ही एक रास्ता बन गया है।
इस पर फेसबुक यूज़र मोहम्मद ज़ाहिद ने बदलती दुनिया बदलता भारत नाम से एक पोस्ट बनाई है जो सोचने पर मजबूर कर देती है।
वह लिखते है
FBP/17-57
बदलती दुनिया और बदलता भारत :-
उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा था कि "भारत के 90% लोग मुर्ख हैं"।
उनकी इस टिप्पणी को अब ऐसे कहा जा सकता है कि "भारत के 90% लोग मुर्ख हो गये हैं"।
दरअसल दुनिया बदल रही है , और हमारा देश भी बदल रहा है , दुनिया जिस बुराई को छोड़कर आगे बढ़ रही है , हमारा देश उस बुराई को अपना कर आगे बढ़ रहा है।
दरअसल हमारे भारत में लोकतंत्र है ही नहीं बल्कि "भेड़तन्त्र" है , हमारा देश लोकतंत्र और आज़ादी के लिए परिपक्व ही नहीं।
मेरा अपना मानना है कि इस देश में अंग्रेजों को 100 साल और शासन करना चाहिए था और 2047 में इसे अपने गुलामी के शासन से मुक्त करना चाहिए था तबतक भारत लोकतंत्र के लिए परिपक्व हो जाता और जस्टिस मार्कंडेय काटजू को यह शब्द कहने नहीं पड़ते।
अभी भी राजशाही अपनाए ब्रिटेन और सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका से भारत बहुत कुछ सीख सकता है परन्तु खुद ही "विश्वगुरू" का झूठा लबादा ओढ़े जो भारत दुनिया को शिक्षा देने के घमंड में जी रहा है वह किसी से क्या सीखेगा।
उदाहरण देखिए
अमेरिका का "ट्विन टावर" ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा ने गिराया और सरकारी आँकड़ों के अनुसार उसमें 2500 लोग मारे गये फिर भी अमेरिका में "गोधरा" की प्रतिक्रिया की तरह "गुजरात" नहीं हुआ। वहाँ क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं हुई।
जानते हैं क्युँ ? क्युँकि वहाँ की जनता भारतीय जनता की तरह 90% मुर्ख नहीं है बल्कि परिपक्व है। वह अमेरिका की हूकूमतों को अमेरिका के बाहर कुछ भी करने का समर्थन तो करती है पर वैसा ही अपने देश में करने पर वह विरोध पर उतर आती है क्युँकि अमेरिका की जनता अपने देश के अंदर के सामाजिक "ताने-बाने" से छेड़छाड़ बर्दाश्त ही नहीं कर सकती।
दक्षिणपंथी डोनल्ड ट्रम्प के चुनाव अभियान से ही उनके आपत्तिजनक बयानों का वहीं की जनता और मीडिया ने विरोध करना शुरु कर दिया तो उनको स्वयं स्पष्टीकरण भी देना पड़ा।
डोनल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद यह विरोध और मुखर हो गया , सोचिएगा की भारत में क्या ऐसा संभव है कि एक राष्ट्रपति के शपथग्रहण समारोह के आयोजन में तमाम लोग उस आयोजन की व्यवस्था से खुद को अलग कर सकते हैं ? मीडिया उस समारोह का बहिष्कार कर सकती है ? औकात ही नहीं "क्रिया की प्रतिक्रिया" लागू होगी और फिर लगाते रहिए सरकारी चक्कर। घुटने टेके पड़े रहेंगे।
परन्तु अमेरिका में यह सब हुआ और हो रहा है। चुने गये राष्ट्रपति के शपथग्रहण समारोह का बहिष्कार किया गया , मीडिया अपनी ही सरकार के विरुद्ध प्रत्यक्ष रूप से खड़ी हो गयी और राष्ट्रपति भवन में डोनल्ड ट्रम्प तक का बहिष्कार कर चुकी है। आज पूरी अमेरिकी मीडिया अपनी ही सरकार से आमने-सामने होकर लड़ रही है।
मुसलमानों और 7 मुस्लिम देशों के लोगों का अमेरिका में प्रतिबंध का वहीं के लोग विरोध कर रहे हैं और इस भेदभाव को नकार रहे हैं।
राष्ट्रपति की एच-1 वीज़ा संबंधी नीति को अमेरिका के अडाणी और अंबानी , अर्थात पेप्सी , गुगल , माइक्रोसॉफ्ट और फेसबुक जैसी कंपनियाँ विरोध कर रही हैं , अमेरिका छोड़कर जाने की धमकी दे रही हैं।
भारत में ऐसा संभव है ? है भारत के अडाणी अंबानी की औकात ? बिलकुल नहीं । यह तो प्रधानमंत्री के आदेश पर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने के लिए घंटो लाइन लगाए खड़े दिखेंगे। याद होगा आपको।
खबर है कि 7 देशों के लोगों पर प्रतिबंध के अमेरिकी राष्ट्रपति के आदेश पर एक फेडरेल अदालत द्वारा रोक लगा दिए जाने के बाद फिर से ज़िद्दी राष्ट्रपति के दिए उसी आदेश को वहाँ की एक दूसरी "हवाई की अदालत" ने रोक दिया है। क्युँकि उस अदालत का मानना है कि यह "भेदभाव" है।
इसके बावजूद कि अमेरिका को उसके इतिहास की सबसे बड़ी चोट ओसामा बिन लादेन और अलकायदा ने दी है। फिर भी वहाँ गुजरात तो छोड़िए इत्तू सा भेदभाव भी नहीं हुआ। यह है स्वस्थ लोकतंत्र जहाँ "अपराधी के धर्म के आधार पर उसके धर्म के सारे लोग अपराधी ठहराए नहीं जाते।" यह है भेदभाव युक्त सामाजिक और न्यायिक व्यवस्था।
सोचिएगा कि अब भारत में ऐसा संभव है ? गुर्दा छील दिया जाएगा कि सर्वोच्च न्यायालय का मुख्यन्यायधीश भें भें करके पूरी महफिल में रोता दिखेगा।
दरअसल आज का भारत "भक्तिकाल" में परिवर्तित हो गया है "कलयुग का भक्तिकाल"।
मैंने सदैव कहा है कि पाकिस्तान भले भारत का दुशमन है परन्तु भारत को पाकिस्तान से सीखने को बहुत कुछ है , श्रीराम ने भी तो मृत्यु के द्वार पर पड़े रावण से सीखने के लिए लक्ष्मण को भेजा ही था , वैसे ही भारत को भी पाकिस्तान से सीखना चाहिए।
भारत आज जिस चरित्र को अपना रहा है पाकिस्तान सदियों से अपनाए इसी चरित्र को अब छोड़ रहा है। जो पहले भारत था उसे पाकिस्तान अपना रहा है और जो पहले पाकिस्तान था उसे भारत अपना रहा है।
पाकिस्तान से यही सीखना चाहिए कि क्युँ बदल रहे हो ? ऐसा क्या खोया जो खुद को बदल रहे हो ? फिर सोच समझ कर यदि उचित लगे तो वह अपनाना चाहिए जो पाकिस्तान त्याग रहा है।
पाकिस्तान में हिंदुओं के प्रति जो भी अत्याचार हुआ हो परन्तु भारत जैसे हज़ारो "मुस्लिम जेनोसाईड" जैसी घटनाओं का इतिहास तो कभी नहीं रहा परन्तु फिर भी धार्मिक कट्टरता के कारण जो कमियाँ थीं वह अब पाकिस्तान छोड़ चुका है।
वहाँ के हिन्दू नागरिकों की धार्मिक व्यवस्था को सुरक्षित करने के लिए अलग से "हिन्दू आचार संहिता" वहाँ की संसद में पास होकर लागू हो चुका है और वहाँ का प्रधानमंत्री अपने देश के हिन्दू नागरिकों के साथ "होली" खेल रहा है। अपने देश के बहुसंख्यक कट्टर मुसलमानों को चेतावनी दे रहा है।
मोदी जी रमज़ान और ईद पर ऐसे ही आना ? यह मेरी तरफ से आपको अग्रिम निमंत्रण है।
नोट : उपरोक्त पोस्ट मोहम्मद ज़ाहिद साहब के निजी विचार है
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