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    Saturday, 18 February 2017

    जानिये आखिर क्यों करोडो भारतीयों को इस एडवोकेट को हीरो मानकर इसका धन्यवाद करना चाहिए



    वर्ष 2014 में जब पेशे से वकील बीरेंदर सांगवान अपने दोस्त के भाई से मिलने अस्पताल गए , जिनका तब ह्रदय का आपरेशन हुआ था , तब उन्होंने कोरोनेरी स्टेंट का डिब्बा देखा और वो ताज्जुब में पड़ गए कि डिब्बे पर कोई अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP नहीं लिखा था और उनके दोस्त को उस स्टेंट के लिए 1,26,000 रुपए भरने पड़े।  बीरेंदर कहते है "मुझे लगा कि यह भाव बहुत ज़्यादा है"

    वापस घर आकर उन्होंने थोड़ी रिसर्च की और सांगवान ने यूनियन हेल्थ मिनिस्ट्री को ख़त लिखा जिसमे उन्होंने शिकायत की कि मरीज़ों से कोरोनेरी स्टेंट के लिए अधिक रुपए वसूले जा रहे है, साथ ही उन्होंने एक RTI लगाईं और पता किया कि यह स्टेंट हेल्थ सेक्टर में किस उत्पाद सूची में दाखिल है।  दवाई या धातु ?


    सांगवान कहते है RTI से मैं हक्का बक्का रह गया। पहले तो मुझे यह पता चला कि इस स्टेंट पर कस्टम ड्यूटी नहीं ली जाती दूसरी बात मुझे यह पता चली कि इसको दवाई की श्रेणी में शामिल किया गया है लेकिन इसपर भारत का कोई प्राइस कण्ट्रोल मैकेनिज्म नहीं लगा क्योकि इसको अभी तक NLEM ( नेशनल लिस्ट ऑफ़ एसेंशियल मेडिसिन यानी आवश्यक दवाओ की राष्ट्रीय सूची ) में दर्ज नहीं किया गया है। तब मैंने सोचा मुझे यह स्टेंट नामक उत्पाद इस लिस्ट में शामिल करवाना है।

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    सांगवान ने 2014 ही में दिल्ली उच्च न्यायलय में एक याचिका दाखिल की जिसमे उन्होंने मांग रखी कि इस स्टेंट नामक उत्पाद ( या दवा ) के दाम को रेगुलेट किया जाए। सांगवान को सफलता मिली और 2015 में कोरोनेरी स्टेंट को NLEM सूची में जगह मिली लेकिन इसपर दाम रेगुलेशन करने में अतिरिक्त 6 महीने और लग गए जब इसको ड्रग्स प्रिंसेस कण्ट्रोल आर्डर,2013 के अन्तर्गत शामिल किया गया।

    अंतिम विजय सांगवान को तब मिली जब 2 साल की कानूनी लड़ाई के बाद मंगलवार को सरकार ने कोरोनेरी स्टेंट का भाव 85 फीसद तक कम कर दिया। सरकार के आदेश के बाद अब इसका अधिकतम खुदरा मूल्य यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस " बेयर मेटल स्टेंट्स " और "ड्रग एल्युटिंग स्टेंट" का भाव 7,623 और 31,080 रुपए हो गया जो पहले 45,000 से 1,21,000 था।

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    विदित हो कि कोरोनेरी स्टेंट एक ट्यूब जैसा उत्पाद होता है जिसे दिल की आर्टरीज़ में लगाया जाता है ताकि रक्त का प्रवाह दिल की ओर सुचारू हो सके।  भारत में प्रतिवर्ष 5 लाख से ज़्यादा स्टेंट्स का उपयोग किया जाता है और ज़्यादातर विदेशो से मंगाया जाता है।

    मंगलवार के दिन इस आदेश के बाद दर्जनों लोग सांगवान के दफ्तर उनको बधाई देने पहुचे।  उनकी लड़ाई का श्रेय लेने वाले बहुत लोग अब नज़र आने लगे जिनमे हमारे साहेब सबसे आगे है।  खुद साहेब की ज़बानी सुन लीजिये


    साहेब के ट्वीट पर सांगवान मुस्कुराते है और कहते है कि केवल यही कार्य नहीं अभी उनके और भी कई कानूनी लड़ाईया चल रही है यह तो बस समाज सेवा है।  सांगवान हफ्ते के दो दिन सिर्फ देश के लिए काम करते है।  फ्राइडे और सैटरडे को वह अन्य वकीलो और कार्यकर्ताओ के साथ मीटिंग करके कानून द्वारा अन्य लड़ाइयों के बारे में चर्चा करते है।

    मौजबॉक्स सब भारतीयों की तरफ से आपका हार्दिक शुक्रिया अदा करता है। 

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