नायब साहिब-ए-सज्जादा दायर-ए-शाह अजमल इलाहाबाद से जिन्होंने 2 साल 3 महीने 17 दिनों में क़ुरआन करीम की तहरीर कर दी अपने हाथों से।
उनसे हुई बातचीत और जैसा की वीडियो में देख सकते हैं उन्होंने बताया की इससे पहले भी उनके खानदान के कई बुज़ुर्गों ने क़ुरआन को तहरीर किया और उन्ही बुज़ुर्गों की दुआ के बदौलत अल्लाह तआला ने मुझ गुनहगार से भी ये काम लिया इस क़ुरआन करीम में सबसे अहम बात ये है की सिर्फ 15 वर्क़ में लिखा गया है यानी 1 वर्क़ पे 2 पारे तहरीर किये गए हैं यानी 15 वर्क में मुकम्मल क़ुरआन और जैसा की वीडियो में देख सकते हैं तहरीर ऐसी है की आराम से पढ़ा जा सकता है।
उन्होंने बताया मै क़ुरआन की तहरीर की शुरुआत 1 जनवरी 2006 से किया और 12 मार्च 2008 को मुकम्मल कर पाया मै अपनी डिस्पेंसरी ने लिखता था मेरी ख्वाहिश थी की मै ये राज़ रखूं और मुकम्मल होने के बाद बतौर तोहफ़ा क़ौम को पेश करूँ।
अहम बात ये की तहरीर के दरमियान 2 साल 3 महीने 17 दिन के अर्शे तक मैंने इस राज़ को राज़ रखा और मुकम्मल होने के बाद जब हमारे यहाँ ख़ानक़ाह में उर्स का प्रोग्राम हुआ तो मैंने अपने बड़े भाई सय्यद सिराजुद्दीन अजमली प्रोफेसर अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी
के ज़रिये क़ौम को बतौर तोहफ़ा पेश किया।
डॉ साहब का एक इंटरव्यू
देखे वीडियो
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