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    Sunday, 19 February 2017

    FACEBOOK NEWS : अर्थव्यवस्था को मंदी से बचाने वाले करोडो ग्रामीण ही, अर्थव्यवस्था से बाहर है : हिमांशू कुमार


    हिमांशु कुमार सामाजिक कार्यकर्ता है जो 18 वर्षो से बस्तर में अहिंसा का पाठ सिखाते हुए आश्रम चला रहे थे।  उन्होंने वहा आदिवासियो को तरह तरह के रोज़गार भी सिखाये और आदिवासियो की ज़मीन छीनने वाली सरकार से कई बार कानूनी लड़ाईया लड़ी जिसमे हमेशा सरकार ही को अदालत ने गलत माना। फ़िलहाल वह भारत भ्रमण पर साइकिल यात्रा द्वारा निकले हुए है और भारत के दूर दराज़ गाँवों में जा रहे है।  वह अपनी यात्रा का हर अपडेट अपने फेसबुक वाल पर देते है।  हाल ही में उन्होंने नया अपडेट दिया।




    हिमांशु कुमार लिखते है कि

    " भारत के गांवों में करोडों लोग ऐसे हैं जिनके पास ज़मीन नहीं है,
    ये लोग कुछ बकरी या गाय या भैंस पाल कर खेतों की मेड़ों पर, खाली पड़े चरागाहों मे, गांव के पास की पहाड़ियों में चरा लेते हैं और अपना गुजरान कर रहे हैं,
    कुछ लोग इन जानवरों का गोबर इकट्ठा कर के उनका कन्डे, गोईठा, या उपले बना कर बेच कर ही पेट पाल रहे हैं,
    कुछ लोग समुन्दर या नदियों में मछली पकड़ कर गुजारा करते हैं,
    ये लोग अपना पैसा बैंक में नहीं रखते,
    बैंक इन को कर्ज़ देने लायक नहीं मानते,
    ये खुद को अनागरिक मान कर खुद के लिये कुछ भी अधिकार मांगे बिना जीते हैं और चुपचाप मर जाते हैं,
    इनके ना तो कोई मानवाधिकार होते हैं ना कोई आर्थिक या राजनैतिक अधिकार,
    लेकिन यही लोग आपकी अर्थव्यवस्था को मन्दी से बचा लेते है,
    क्योंकि यही करोड़ों लोग अरबों रुपयों का गुड़ चीनी चाय पत्ती आटा चावल साइकिल, ब्लेड कपड़ा खरीदते हैं,
    लेकिन फिर भी ये करोड़ों लोग आपकी अर्थ व्यवस्था के बाहर हैं,
    इनके रहते आपके उद्योग चलते रहते हैं, आपको रोज़गार मिलता रहता है,
    जब कभी अमीर पूंजीपतियों के लिए किसानों की ज़मीन छीनी जाती है,
    तो ये लाखों लोग बिना मुआवज़े या पुर्नवास के भूख गरीबी बीमारी कुपोषण और मौत के मुंह में धकेल दिये जाते हैं,
    यह सीधे सीधे जनसंहार है,
    ये लोग मूल रूप से दलित आदिवासी और घुमंतु जातियां हैं,
    हम विकास के नाम पर इन करोड़ों लोगों की हत्या कर देंगे,
    आजकल अपनी साइकल यात्रा में मैं इन लोगों से मिल रहा हूँ, चर्चा कर रहा हूं, इनकी झोपड़ी टपरी में खाना खा रहा हूँ, सो रहा हूँ,
    ये बहुत शानदार और दिलदार लोग हैं,
    यकीन मानिये ये बिल्कुल हमारे आपके जैसे ही हैं,
    नोटबन्दी दरअसल इन जैसे लोगों की छोटी बचत को बैंक में लाने के लिये थी,
    इनकी बचत को ही अमित शाह पैरेलल अर्थव्यवस्था कहता है,
    भारत की कई परतें हैं,
    भारत को जानने के लिये एक जीवन बहुत छोटा है। "


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