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    Tuesday, 14 February 2017

    इस फेसबुक यूज़र एवं कार्यकर्ता ने बताया कैसे नोटबंदी ने गाँवों को आहात किया है


    जबसे नोटबंदी हुई है उसका असर समाज के निचले तबको पर ज़्यादा पड़ा है।  नकदी के न होने के कारण मज़दूरों की मज़दूरी मारी जा चुकी है।  भारत में ऐसे करोडो गरीब लोग है जिनके पास पहचान पत्र नहीं है , यदि है तो बैंक अकाउंट नहीं है , यदि बैंक अकाउंट भी है तो वो गाँव में नहीं है।  कुल मिला कर यह कि छोटी व्यावसायिक इकाइयां बंद हो गयी, मज़दूर वापस गाँवों की तरफ लौट गए , मज़दूरिया कम हो गयी।

    इस संकट की घडी में जहां सरकार को क्रांतिकारी कदम उठाने चाहिए थे वही सरकार अपनी ही प्रजा पर अत्याचार करने में लगी हुई है।  जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता और आदिवासी कल्याण में 18 वर्ष आदिवासी इलाको में गुज़ार चुके श्री हिमांशु कुमार ने फेसबुक पर अपनी पोस्ट के माध्यम से राजस्थान के गरीब लोगो का दर्द बांटा। श्री हिमांशु कुमार फिलहाल साइकिल यात्रा पर निकले हुए है और गाँव गाँव घूम रहे है।  आज वह अजमेर के पास एक नया गाँव में पहुचे जहां के ग्रामीणों का दुःख उन्होंने अपनी निम्नलिखित पोस्ट पर शेयर किया।



    उन्होंने लिखा

    "आज साइकिल चलाते हुए राजसमन्द और अजमेर जिले की सीमा पर स्थित नया गांव में पहुँचा,
    मेज़बान एक सास बहु थीं,
    बहु की उम्र 27 साल,
    आठ माह पहले पति की मृत्यु हो गई,
    साल भर के बच्चे को छोड़ कर नेरेगा में मज़दूरी करने जाती है,
    सरकार को इस साल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सूखाग्रस्त क्षेत्रों में नेरेगा मे सौ की बजाय डेढ़ सौ दिन काम देना था,
    लोगों ने 135 दिन काम किया तो मोदी जी को सपना आया कि इन लोगों को सौ दिन से ज़्यादा का पैसा मत दो,
    अब राजस्थान की भाजपा सरकार गरीब विघवाओं और मज़दूरों को मज़दूरी में दिया गया पैसा वापिस वसूल रही है,
    आप अगर गांव में लोगों से बात करेंगे तो आप को महसूस होगा कि सरकार लोगों के साथ कितनी क्रूर और उनकी दुश्मन है,
    एक सरकार उद्योगपतियों को पांच लाख करोड़ की सब्सिडी दे सकती है,
    दूसरी तरफ वही सरकार गांव वालों की काम करी हुई मज़दूरी भी वापिस वसूल रही है,
    इसे कहते हैं क्रूरता की इंतेहा,
    गांव में पानी एक किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है,
    पानी को घी की तरह संभाल कर खर्च करना पड़ता है,
    अगली बार शावर के गर्म पानी के नीचे खड़े होकर सोचियेगा ज़रूर,
    सास का नाम गेंदी बाई है,
    वे गांव की महिलाओं में जागरूकता जगाने का काम करती हैं,
    वे बताती हैं 18 साल पहले भंवरी बाई के साथ दबंगों के सामूहिक बलात्कार का विरोध करने वे धरना देने जयपुर गई थीं,
    तब भैरों सिंह शेखावत की भाजपा सरकार थी,
    तब गेंदी बाई ने पुलिस की लाठियां खाई थीं और जेल गई थीं,
    गेंदी बाई ने बताया कि सुबह तीन बजे उठकर नज़दीक के हैण्ड पम्प पर 2 मटकी पानी निकलता है और फिर पानी खत्म हो जाता है,
    लेकिन वो पानी खाना बनाने या पीने लायक नहीं है,
    उन्होने मुझे वो पानी दिखाया,
    गांव में मोबाइल सिग्नल नहीं आता,
    मैनें कहा मोदी जी का कैशलेस यहाँ कैसे चलेगा,
    यह बात तो गांव वालों को समझ में नहीं आई,
    लेकिन गांव वालों ने बताया नोटबन्दी के बाद शहरों में काम करने वालों की मजदूरी 3OO से घट कर 8O रूपये हो गई थी,
    क्योंकि शहर में सेठों के पास भी नगद पैसा नहीं था,
    हमारी फेसबुक की दुनिया और भारत की ज़मीनी हकीकत में बहुत दूरी है,
    हम यहां जो चर्चा करते है उनमें वो बातें शामिल ही नहीं होतीं जो इस देश के करोड़ों लोग रोज भोगते हैं,
    मुझे आश्चर्य यही है कि ये लोग यह सब कुछ सह क्यों रहे हैं ?
    ये लोग बग़ावत क्यों नहीं कर रहे ?"

    मौजबॉक्स आशा करता है सरकार ऐसे गाँवों में बुनियादी सुविधाएं देने की ओर अतिशीघ्र कदम उठाएगी।

     ऐसे ही अन्य पोस्ट के लिए आप हमसे जुड़े रहिये क्योकि हम दिखाएंगे आपको इक्कीसवी सदी का ज़मीनी भारत जो आपकी शहरी कालोनी से बहुत दूर है  

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